शुक्रवार सुबह सात बजे में बठिंडा से हिसार की ट्रेन मे बैठा । सामान्य श्रेणी वार्ड था, उस वक्त डिब्बे मे एक ही आदमी था।जैसे ही मै उसके बगल मे बेठा, उसने अजीब तरीके से देखा, उसे लगा शायद अब उसका सब सीटों पर जो एकाधिकार है वो खत्म हो जाएगा।
जैसे जैसे लोग बढ रहे थे उन महाशय की भोहें तन रही थी। मै बङे गौर से देख रहा था, इतने में एक महिला ओर पुरूष डिब्बे में आये पर कोई भी सीट खाली नही है, महिला अपने साथी सें कह रही थी मुझे कोई सीट दिलाओ उन दोनो ने आगे ओर पिछे दोनो ङिब्बों मे देखा पर कही कोई सीट नही। शायद महिला ने फिर से पुछा की किसी से बात करो सीट के बारे में, व्यक्ति चिल्लाया तुम्हे बैठना है तो तुम पुछ लो किसी से।
मैं ऊठा और अपनी सीट उस महिला को दे दी।
ट्रेन मे ही नही हमारे महान भारत मे सब जगह एसा ही है।
सीट चाहे बस की हो या किसी मंत्री की एक बार मिल गई तो इंसान उससे टस से मस नही होता। इंसान की फितरत ही एसी है, बस अपने लिए जगह चाहिए फिर किसी को गिराना भी पङे तो इंसान को कोई गुरेज नही।
इतिहास गवाह है इस कुर्सी के लिए बेटे ने बाप का ओर भाई ने भाइ का कत्ल किया है। पर ये कुर्सी कभी किसी की नही हुई।
शायद यही खासियत है कुर्सी की, बेवफा होकर भी जनता से वफा करती हेै।
जिस दिन ये किसी एक से वफा कर लेगी तो वो गुलामी का मंजर खतरनाक होगा।।
कुर्सी का नशा ही कुछ ऐसा है बङे बङो की जात बदल जाती है।
पर फिर कुर्सी भी अपनी जात दिखाती हेै
देश मे जितने भी लोग इस कुर्सी पर बैठे अगर उन मे से किसी एक ने भी अगर अपने इमान से काम किया होता तो आज मंजर कुछ और होता।
पिछले कुछ वर्षो मे मैने भी एक दो चुनाव देखे ओर ये पाया की जनता ने जिससे भी उम्मीद लगाई उसीने जनता की बैंड बजाई।
मगर फिर जनता भी अच्छे से बजाती है।
अब सवाल ये हे हम कब तक एक दूसरे को बजाते रहेंगे
अब वक्त आ गया है एक दुसरे को सुनने का।
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Sunday, March 17, 2019
कुर्सी
Monday, March 11, 2019
सनसनी ओर सन्नाटा
समाचार चैनल (ब्राडकास्ट मिडियम) की सबसे बङी मजबूरी ये हो गई है कि साधारण समाचार सुनने ओर देखने मे लोगो की दिलचस्पी नही रही।
आजकल हर अखबार ओर चैनल सनसनी की तलाश मे रहता है। बदकिस्मती सें अगर कोई वाकया हो गया तो बस बन गया काम।अखबारो ओर चैनलो के साथ जनता का वक्त भी अच्छा बीत जाता है। सनसनी खत्म तो पङोसी भी पुछ लेता है, इतना सन्नाटा क्यों है भाई।
सब तमाशबीन है, किसी भी घटना या वाकये को उत्सव की तरह लेते है । जब उत्साह खत्म तो डब्बा गुल।
कभी सनसनी मिल जाती है तो कभी सनसनी बनानी पङती है।कभी राफेल को उठाया जाता है, तो कभी राफेल के कागजात।
हमारे एक युवा नेता तो रोज एक नई सनसनी ले आते है, ये आजकल इतनी खबरे बना रहे हे की समाचार एजेंसिया भी इनके सामने कुछ नही। नेता तो नेता अब तो अभिनेता भी पैसे लेकर खबरे बना रहे है। जनता को अब इस मसाले की आदत इस कदर हो गई है कि जब तक वो कोई डिबेट शो नही देख लेते, जिसमे ऐंकर ओर मेहमान एक दुसरे को गालिया दे रहे हो, खाना नही पचता। अगर ये पत्रकारिता है तो , फिर पत्रकारिता क्या है ?
Thursday, March 7, 2019
शुक्रिया जिंदगी
महिलाऐं, जिस तरह एक माॅ, बहन, बीवी ओर बेटी के रुप में सबपे अपना स्नेह लुटाती है। उसको सिर्फ चंद अलफाज में बयां करना नामुमकिन है। फिर भी मै कोशिश करूंगा। जितनी भी महिलाओं से में अब तक मिला हुॅ , या जिनको जानता हूँ, वो मुझसे बङे ही प्यार सें पेश आते है। मैंने अपनी माॅॅ को एक दशक सें नही देखा, तेरह साल पहले वो इस दुनिया से चली गई थी, लेकिन जब तक मै जिंदा हू उनकी यादे मेरे जेहन सें धुंधली नही हो सकती।
हालांकि मेरे घर ओर परिवार मे ओर भी महिलाऐ है, जिनसे खूब स्नेह मिला, दो भाभी हैं, उनकी दो बेटियां हैं, जो मुझे बेहद अजीज हैै।जिंदगी मे कुछ ओर भी महिलाओ सें नि:स्वार्थ स्नेह मिला। इन सभी महिलाओ के प्रति मे हमेशा कर्जदार रहूंगा।
ऑश्चर्य होता है ओरत के दामन मे इतना प्यार आता कहां से है। शायद उपरवाले ने ओरत के दामन को महासागर (समुद्र) से ज्यादा प्यार अपने अंदर वहन करने की ताकत दी है।
एक ओरत ही ऐसा कर सकती है।
सबको अन्तर्राष्ट्रिय महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाये।
Wednesday, March 6, 2019
जनसंचार द्वन्द
जिस तरह की रिपोर्टिंग कर रहे है वो तो एक अलग मुद्दा है उसके बारे में सब को पता है कि मीडिया किस तरह का काम कर रहा है।
दूसरे को दोष देना और वही काम खुद भी किये जाना अपने आप में एक बहुत बङी कला है, ओर काबिल ए तारीफ है, और पत्रकारिता में इस वक़्त यह एक नयी लत बन गया है।
कौन चोर है कौन ईमानदार है, बस एक दुसरे पर आरोप लगाते रहो। पत्रकारिता में हाल ही में बहुत से ऐसे मंच आ गए है जो वेब आधारित है, और खुद को आत्मनिर्भर और ईमानदार कहते है, और जनता से आर्थिक मदद भी मांग रहे है।
पर क्या हम इनकी ईमानदारी पर पूरी तरह विश्वास कर सकते है ? यह एक बड़ा सवाल है।
इन नए आत्मनिर्भर जनसंचार माध्यमों में काम करने वाले पत्रकार तो वही है, जो पहले संचार चैनलो और अखबारों से जुड़े हुए थे, वो कोई मंगल गृह से तो आये नहीं है।
हाल ही में द वायर ने रवीश कुमार के साथ वर्तमान पत्रकारिता पर हुई एक चर्चा दिखाई जिसमें रवीश कुमार एक तरह से जनता के दिलो दिमाग में एक राय बनाते नजर आये।
रवीश ने पत्रकारों पर गंभीर सवाल उठाये और मौजूदा राजनीतिक हालात पे भी बात की , जिसमे सब दूसरे पत्रकारों और चैनलों को उन्होंने किसी राजनितिक विचार धारा और किसी व्यक्ति विशेष का समर्थक बताया, जो सरकार और राजनीतिक पार्टियों की विचारधारा को लोगो के दिमाग में डाल रहे है।
रवीश कुमार के हिसाब से सिर्फ दो चार पत्रकार और जनसंचार माध्यम ही सच्ची पत्रकारिता कर रहे है।
अगर आपको अंगूर नहीं मिले तो अंगूर खट्टे है ये तो वही बात हो गई।
रवीश ये भूल गए शायद की जिस मीडिया हाउस से वो जुड़े हुए है उसके जरिये वो भी जनता के बीच रोज रात को अपनी और अपने चैनल की विचारधार जनता के दिमाग में डालते है वो भी रिपोर्टिंग नहीं प्रोपोगैंडा है।जिस यकीन और आत्मविश्वाश से रवीश अपने विचार जनता से साझा करते है की दर्शक के पास यकीन करने के आलावा दूसरा रास्ता ही नही होता।
शायद उनके पास कोई यन्त्र है जिससे झूठ और सच को मापा जा सकता है।
बेशक अभी पत्रकारिता जगत के जो माजूदा हालत है , पत्रकारों की चिंतन करने की जरूरत है, की वो इस पैशे में किसलिए आये है और क्या कर रहे।
Sunday, March 3, 2019
स्त्री ओर संघर्ष
Friday, March 1, 2019
एक ही रास्ता
मेरे ख़याल से ये पाकिस्तान का डर भी है और ये पाकिस्तान की चाल भी है।
इमरान खान अब एक अलग तरह की रणनीति पे काम कर रहा है।
वो अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि बदलना चाहता है चीन समेत कोई भी पाकिस्तान समर्थक देश खुलकर पाकिस्तान की मदद करने को तैयार नहीं है ।क्योंकि पाकिस्तान के मुखोटे के पीछे जो दह्सतगर्दी है उससे सब वाकिफ है ।
जब से इमरान खान ने सत्ता संभाली है जब भी वो बोलता है तो भारत के साथ अपने सम्बन्ध सुधारने की बात करता है, एक नए पाकिस्तान की बात करता है, तरक्की की बात करता है दहशतगर्दी को ख़तम करने की बात करता है ये एक प्रोपागैंडा भी हो सकता है और उसकी मजबूरी भी हो सकती है। शायद पकिस्तान को ये समझ आआ गया है की तरक्की पसंद मुल्क को दहशतगर्दी से कोई फायदा नहीं है
इमरान खान ने कहा भी है की अब उसकी जमीन दहशतगर्दी के लिए इस्तेमाल नहीं होगी ।
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मेंटल ही है
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